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गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

वाई-फ़ाई से 100 गुना तेज़ है लाई-फ़ाई

Image result for lifi logoअब डेटा ट्रांसफर के लिए ऐसी तकनीक आ चुकी है जो वाई-फ़ाई के मुक़ाबले 100 गुना तेज़ है.
और इस तकनीक को विकसित करने वाले हैं भारतीय तकनीशियन. लाई-फ़ाई का इसी सप्ताह एस्तोनिया के टालिन में परीक्षण किया गया.
लाई-फ़ाई से वाई-फ़ाई के मुक़ाबले आप 100 गुना तेज़ इंटरनेट चला सकते हैं और इसकी रफ़्तार एक गीगाबिट प्रति सेकेंड तक हो सकती है.
स्टार्टअप कंपनी वेलमेनी के सह संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी दीपक सोलंकी ने बीबीसी को बताया कि यह तकनीक कॉल ड्रॉप जैसी समस्याओं के लिए रामबाण साबित हो सकती है.
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Image result for lifi logoसोलंकी ने बताया कि उनकी कंपनी एस्तोनिया में पंजीकृत है लेकिन इसकी पूरी टीम भारतीय है.
यह पूछने पर कि क्या उन्हें भारत में कोई निवेशक नहीं मिला, सोलंकी कहते हैं कि ढाई साल पहले उन्होंने कोशिश की थी लेकिन यहां निवेशकों ने इसे कपोल कल्पना बताकर नकार दिया था.
लाई-फ़ाई चलाने के लिए आपको चाहिए बिजली का एक स्रोत जैसे एलईडी बल्ब, इंटरनेट कनेक्शन और एक फ़ोटो डिटेक्टर.
वेलमेनी ने एक गीगाबिट प्रति सेकेंड की रफ़्तार से डेटा भेजने के लिए एक लाई-फ़ाई बल्ब का इस्तेमाल किया. परीक्षण में पता चला कि सैद्धांतिक तौर पर यह रफ़्तार 224 गीगाबिट प्रति सेकेंड तक हो सकती है.
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यह परीक्षण एक ऑफ़िस में किया गया ताकि कर्मचारी इंटरनेट चला सकें. साथ ही एक औद्योगिक क्षेत्र में भी इसका परीक्षण हुआ जहां इसने एक स्मार्ट लाइटिंग सॉल्यूशन मुहैया कराया.
सोलंकी के मुताबिक़ यह तकनीक तीन से चार साल में उपभोक्ताओं तक पहुंच जाएगी.
उन्होंने कहा कि लाई-फ़ाई के इस्तेमाल के लिए मोबाइल पर एक डिवाइस लगानी होगी पर भविष्य में यह वाई-फ़ाई और ब्लूटूथ की तरह मोबाइल में ही इनबिल्ट होगी.
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जहां रेडियो तरंगों के लिए स्पेक्ट्रम की सीमा है, वहीं विज़िबल लाइट स्पेक्ट्रम 10,000 गुना ज़्यादा व्यापक है. इसका मतलब यह है कि इसकी निकट भविष्य में खत्म होने की संभावना नहीं है.
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इसमें सूचना को लाइट पल्सेज़ में एन्कोड किया जा सकता है जैसे रिमोट कंट्रोल में होता है.
एलईडी ब्रॉडबैंड कनेक्शन के लिए पर्याप्त डेटा ट्रांसमिट करने में सक्षम है और फिर भी यह सामान्य दूधिया रोशनी की तरह दिखता है.
लाई-फ़ाई शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले एडिनबरा विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हेराल्ड हास ने किया था. उन्होंने 2011 में टैड (टेक्नोलॉजी, एंटरटेनमेंट एंड डिजाइन) कांफ्रेंस में इसका प्रदर्शन किया था.
उन्होंने एक एलईडी बल्ब से वीडियो भेजकर दिखाया था. उनकी प्रस्तुति को क़रीब 20 लाख बार देखा जा चुका है.
प्रोफ़ेसर हास ने ऐसे भविष्य की कल्पना की थी जब बिजली के अरबों बल्ब वायरलैस हॉटस्पॉट बन जाएंगे.
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लाई-फ़ाई का बड़ा लाभ यह है कि यह वाईफ़ाई की तरह दूसरे रेडियो सिग्नल में खलल नहीं डालता. यही कारण है कि इसका इस्तेमाल विमानों और दूसरे ऐसे स्थानों पर किया जा सकता है.
लेकिन इस तकनीक की कुछ खामियां भी हैं. इसकी सबसे बड़ी खामी यह है कि इसे घर के बाहर धूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता क्योंकि सूर्य की किरणें इसके सिग्नल में दखल देती हैं.
यह तकनीक दीवार के आरपार इस्तेमाल नहीं की जा सकती. इस तरह शुरुआत में यह वाई-फ़ाई नेटवर्क के पूरक के रूप में काम करेगी.
संकरे शहरी इलाक़ों या अस्पताल जैसी जगहों पर जहां वाई-फ़ाई सुरक्षित नहीं है, इसका उपयोग हो सकता है.
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